गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू की 121वीं जयंती श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाई गई
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सरायकेला-खरसावां: जिले के राजनगर प्रखंड अंतर्गत रोला स्थित पंडित रघुनाथ मुर्मू चौक में आदिवासी सेंगेल अभियान के तत्वावधान में संताली भाषा की ओलचिकी लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू की 121वीं जयंती श्रद्धा, गर्व और उल्लास के साथ मनाई गई। कार्यक्रम की शुरुआत नायके बाबा कादे मुर्मू के नेतृत्व में पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाजों के तहत विधिवत पूजा-अर्चना से हुई, जिसके बाद उपस्थित लोगों ने गुरु गोमके को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान पूरे क्षेत्र में सांस्कृतिक उत्साह का माहौल देखने को मिला और बड़ी संख्या में ग्रामीण महिला-पुरुष इस आयोजन में शामिल हुए।कार्यक्रम को संबोधित करते हुए रोला माझी बाबा सुगनाथ हेंब्रोम ने गुरु गोमके के जीवन और योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पंडित रघुनाथ मुर्मू का जन्म 5 मई 1905 को ओडिशा के मयूरभंज जिले में हुआ था और मात्र 20 वर्ष की आयु में उन्होंने ओलचिकी लिपि का आविष्कार कर संताल समाज को एक नई पहचान प्रदान की। वर्ष 1925 में उन्होंने इस लिपि को समाज के सामने प्रस्तुत किया और जीवनभर इसके प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित रहे। वे केवल एक लिपि के जनक ही नहीं, बल्कि एक कुशल शिक्षक, साहित्यकार और नाटककार भी थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को जागरूक करने का कार्य किया।इस अवसर पर वक्ताओं ने ओलचिकी लिपि के संरक्षण और संताली भाषा के समग्र विकास पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि गुरु गोमके का सपना केवल एक लिपि का निर्माण करना नहीं था, बल्कि संताल समाज को शिक्षित, संगठित और सांस्कृतिक रूप से सशक्त बनाना था। इसलिए उनकी विरासत को आगे बढ़ाना आज की पीढ़ी की जिम्मेदारी है। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने उनके अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प भी लिया और संताली भाषा के प्रचार-प्रसार को नई दिशा देने पर चर्चा की गई।कार्यक्रम के दौरान रोला चौक पर स्थापित उनकी प्रतिमा के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले स्वर्गीय विष्णु मुर्मू एवं स्वर्गीय कॉपरा मुर्मू को भी श्रद्धापूर्वक नमन किया गया। आयोजन में जोगमाझी बाबा दन्दुचरण हेंब्रम, पार्वती हेंब्रोम, जॉन मुर्मू, विजय हांसदा, बुधू टुडू, रश्मि हेंब्रोम, छोटी मुर्मू, बुघू टुडू, दिकुराम मुर्मू, अनिल हांसदा, संगीता मुर्मू, माही टुडू, पूनम मुर्मू, सावना हांसदा, सागुन मुर्मू, आर्यन मुर्मू, राम मुर्मू, बबलू हेंब्रम, लुलीन मुर्मू, तिलका मुर्मू, राजकुमार हेंब्रम, कालू हांसदा, गोपना हांसदा, दिवस हांसदा, भागरीत टुडू, संजय टुडू, जोवा मुर्मू, श्रुति मुर्मू सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।इस आयोजन ने न केवल गुरु गोमके के योगदान को याद किया, बल्कि नई पीढ़ी में अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान के प्रति जागरूकता बढ़ाने का भी संदेश दिया।
