March 1, 2026

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आनन्दमार्ग प्रचारक संघ सेमिनार में आचार्य सिद्धविद्यानंद अवधूत ने बताया — ब्रह्मप्राप्ति ही एकमात्र आध्यात्मिक पथ

जमशेदपुर: आनन्दमार्ग प्रचारक संघ द्वारा आयोजित द्वितीय संभागीय सेमिनार में वरिष्ठ आचार्य सिद्धविद्यानंद अवधूत ने “साधना” विषय पर विस्तारपूर्वक व्याख्यान देते हुए कहा कि आनन्दमार्ग के अनुसार मत अनेक हो सकते हैं, परंतु आध्यात्मिक उत्कर्ष का पथ एक ही है और वह है ब्रह्मप्राप्ति का पथ। उन्होंने साधना मार्ग के तीन प्रमुख स्तर—शाक्त, वैष्णव और शैव—की व्याख्या करते हुए बताया कि तीनों का पारमार्थिक मूल्य समान है और साधक अपनी योग्यता एवं अवस्था के अनुसार इन स्तरों के माध्यम से आध्यात्मिक प्रगति कर सकता है। आचार्य ने कहा कि शाक्त साधना में जैवभाव से शिवभाव की ओर यात्रा प्रारंभ होती है, जो मुख्यतः कर्मप्रधान होती है और प्रत्याहार योग के माध्यम से साधक जगत सेवा की दिशा में अग्रसर होता है। वैष्णव स्तर में निःस्वार्थ भक्ति का उदय होता है, जहां कर्म और भक्ति का समन्वय दिखाई देता है, जबकि शैव स्तर ज्ञान स्वरूपता और ब्रह्मस्वरूप भाव की अनुभूति का प्रतीक है।प्रत्याहार साधना के चार चरण—यतमान, व्यतिरेक, एकेन्द्रिय और वशीकार—पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि यतमान अवस्था में साधक मानसिक वृत्तियों को नियंत्रित करने का प्रयास करता है, व्यतिरेक अवस्था में कुछ वृत्तियाँ नियंत्रित होती हैं जबकि कुछ शेष रहती हैं, एकेन्द्रिय अवस्था में वृत्तियाँ निम्न से ऊर्ध्व की ओर उन्मुख होती हैं और वशीकार अवस्था में अस्तित्व महत् तत्व की ओर उन्मुख होकर मन आत्मा के पूर्ण नियंत्रण में आ जाता है।

उन्होंने कहा कि वशीकार सिद्धि की अवस्था में साधक अपनी मूल वृत्तियों पर नियंत्रण प्राप्त कर जीवभाव से ईश्वरभाव की ओर रूपांतरण का अनुभव करता है।आचार्य ने मत और पथ के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि देश, काल और पात्र के अनुसार मत परिवर्तित हो सकता है, परंतु आध्यात्मिक लक्ष्य अपरिवर्तनीय है। उन्होंने कहा कि आनन्दमार्ग किसी विशेष मत, देश या काल का समर्थक नहीं, बल्कि समग्र मानवता को आध्यात्मिक रूपांतरण की दिशा में प्रेरित करने वाला मार्ग है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यह धारणा गलत है कि जितने मत हैं उतने पथ हैं; वास्तव में सभी साधनाओं का अंतिम लक्ष्य परमगति अर्थात ब्रह्मत्व की प्राप्ति है, जहां साधक अपने जीवन के सभी आयामों का समन्वय करते हुए आध्यात्मिक चेतना की सर्वोच्च अवस्था की ओर अग्रसर होता है।

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