महंगे टॉप कॉलेज या समझदारी भरा निवेश? उच्च शिक्षा की बढ़ती लागत पर उठ रहे सवाल
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जमशेदपुर:देश के बड़े शहरों—खासकर बेंगलुरु, पुणे और दिल्ली—में टॉप कॉलेजों में दाखिले के नाम पर छात्र लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं। चार वर्षीय कोर्स के लिए केवल ट्यूशन फीस ही ₹30 से 40 लाख तक पहुंच रही है। इसके साथ ही किराया, भोजन, यात्रा और अन्य दैनिक खर्च जोड़ने पर कुल खर्च ₹45 से 50 लाख तक हो जाता है।जानकारी के अनुसार, बड़े शहरों में छात्रों का मासिक किराया ₹15,000 से ₹20,000 तक होता है। वहीं रोजमर्रा के खर्च और अन्य जरूरतों पर सालाना लगभग ₹3 लाख अतिरिक्त खर्च हो जाता है। ऐसे में चार साल की पढ़ाई एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बड़ा आर्थिक बोझ बन जाती है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बाद नौकरी की गारंटी मिलती है? वर्तमान समय में केवल डिग्री नौकरी की सुनिश्चितता नहीं देती। कई मामलों में छात्रों को शुरुआती दौर में ₹15,000 से ₹20,000 प्रतिमाह की नौकरी ही मिल पाती है, जिससे निवेश और रिटर्न के बीच असंतुलन साफ दिखाई देता है।

इस विषय पर ई डिजिटल इंडिया के निदेशक रामकृष्ण ठाकुर ने कहा,“आज का दौर स्किल आधारित शिक्षा का है। केवल बड़ी फीस देकर डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं है। कंपनियां अब प्रैक्टिकल नॉलेज, डिजिटल स्किल और समस्या समाधान क्षमता को प्राथमिकता देती हैं। यदि छात्र लोकल कॉलेज में कम खर्च में पढ़ाई करते हुए AI, डिजिटल मार्केटिंग, डेटा एनालिटिक्स और टेक्नोलॉजी आधारित स्किल सीखें, तो कम निवेश में बेहतर करियर बना सकते हैं।”उन्होंने आगे कहा कि अभिभावकों और छात्रों को भावनात्मक निर्णय के बजाय “करियर ROI” यानी निवेश और रिटर्न को ध्यान में रखकर फैसला लेना चाहिए।जमशेदपुर और झारखंड के कई छात्र अब “लोकल टू ग्लोबल” की सोच के साथ कम खर्च में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सफलता केवल अधिक पैसा खर्च करने से नहीं, बल्कि सही योजना और सही कौशल से मिलती है।
